Tuesday, September 22, 2009

प्यार की दास्ताँ


कभी हम थे बेवफा

कभी तुम थे खफा

पर इनमे भी था एक मज़ा

जिसमे था प्यार का नशा

वो तेरा तन्हाई में आना

खाली दिल को खुशी दे जाना

अच्छा लगता था तेरा मुस्कुराना

मुझे देख के हल्का शर्माना

सोचा था सब कह दूंगा एक दिन

देखते रह जाएगा जहाँ

पर था डर तुम्हे खोने का

इसलिए बंद रही जुबां

वो दिन था सुहाना

कहनी थी दिल की बात

पंहुचा उसके घर के पास

सोचा आई है सौगात

पहुच कर उसके करीब

बोला तुम हो मेरा नसीब

पकड़ कर उसका हाथ

केह दी दिल की बात

वो बोली क्यू करते हो नादानी

मैं हूँ किसी और की रानी

टूट गया मेरा सपनों का जहाँ

ख़त्म हुई प्यार की दास्ताँ

2 comments:

monali said...

The soul of the poem is really beautiful... i liked it...keep writting...

हरकीरत ' हीर' said...

वो तेरा तन्हाई में आना

खाली दिल को खुशी दे जाना

अच्छा लगता था तेरा मुस्कुराना

मुझे देख के हल्का शर्माना

बहुत खूब ....!!